सोमवार, 25 फ़रवरी 2008

सिनेमाई पटल पर छाये नौनिहाल


बॉलीवुड में निर्देशकों की नई खेप के आने के बाद सिनेमा की हर विधा में बदलाव नजर आए। कहानी, पटकथा, संगीत से लेकर किरदारों को पेश करने के तरीके में सिनेमा में दबंग हुआ है। निर्देशकों की नई पीढ़ी खतरों से खेलने की बड़ी शौकीन है। तारे जमीन पर में आमिर खान ने दर्शील सफारी को फिल्म का हीरो बनाकर दबंग सिनेमा की मिसाल पेश की है। इस फिल्म में आमिर ने इस मिथ को तोड़कर दिखाया कि बच्चे सिर्फ हीरो के बचपन का रोल ही नहीं कर सकते, अगर उन्हें मौका दिया जाय तो वह ऐसी अदाकारी दिखाएंगे कि फिल्मफेयर की जूरी को बेस्ट एक्टर का चुनाव करते समय पसीना आ जाएगा। हालांकि आमिर से पहले समीर कार्णिक नन्हें जैसलमेर, विशाल भारद्वाज ब्लू अम्ब्रेला, केन घोष की चेन कुली की मेन कुली और साजिद खान की हे बेबी में नई पौध को मुख्य किरदार में पेश करके इसकी झलक दिखा चुके हैं. आज से कुछ साल पहले तक बच्चों में बॉलीवुड ने खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। उनको केवल हीरो का बचपना दिखाने के लिए फिल्म में लिया जाता था। बीच में अगर कुछ गिनी चुनी फिल्में आईं भी, तो वो अमिताभ, शाहरुख और रितिक की फिल्मों के शोर में खो गईं. मगर अब बच्चों को लेकर फिल्में बनाना फायदे का सौदा साबित हो रहा है। जबसे मकड़ी ने ७५ लाख और हनुमान ने तीन करोड़ का बिजनेस किया है तबसे बॉलीवुड ने बच्चों को लेकर और बच्चों के लिए फिल्म बनाने के लिए गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया है। आज बच्चों को एक बड़े उपभोक्ता के तौर पर देखा जाने लगा है।

2 टिप्‍पणियां:

दीप जगदीप ने कहा…

फिल्मी पर्दे के पीछे झांकने और सही टरेंड को परखने के लिए आभार
खुद आमीर ने दर्शील को अपने से बड़ा मौका देकर साबित कर दिया कथा सबसे अहम है, किरदार उसका हिस्सा है और अगर जरूरत पड़े तो हीरो जो खुद प्रोड्यूसर डायरेक्टर है और जिसके नाम पर फिल्म बिक रही है, वो आधी फिल्म के बाद पर्दे पर नजर आए। दूसरे बॉलिवुडियों को इससे सबक लेना चाहिए।

मुनादीवाला ने कहा…

आपका नया खुलाचिट्ठा कोई मेंबरशिप नहीं
यहॉं सब एकदम खुला...भड़ास क्‍या जो चाहे निकालो। कोई मेंबर ऊंबर नहीं बनना कोई झंझट नहीं। अरे कोई पार्टी खोले हैं कि एमपी बनना है। चैनलहू नहीं खोलना। तो काहे मेंबरशिप। जो यार लिखना चाहे सीधे khulachittha.post@blogger.com पर मेल करदे। पोस्‍ट सीधे अपने आप छप जाएगी, हमारे पास नहीं आएगी सीधे ब्‍लॉग पर जाएगी। डायरेक्‍ट आपही मालिक हर लिखे के, कोई झंझट नहीं कोई गिनती नहीं कि आज इतने हो गए आज उतने। तो फिकर काहे की, हो जाओ शुरू।
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