गुरुवार, 3 जुलाई 2008

गुलज़ार का जादू


जार-जार रोने और जोर-जोर से हंसने वाली, हर बात को, हर जज्बात को अति नाटकीय ऊंचाइयों तक ले जाने वाली मुंबइया फिल्मों की दुनिया में एक शख्स ऐसा आता है, जिसे मालूम है कि खामोशी भी बोलती है... कि बहते हुए आंसुओं से ज्यादा तकलीफ पलकों पर ठहरे मोती पैदा करते हैं...कि रुलाइयों से ज्यादा असरदार भिंचे हुए होठों के पीछे छुपाए गए दुख होते हैं।दरअसल, गुलज़ार ने हिंदी फिल्मों को कम बोलकर ज्यादा कहने का सलीका दिया। जिस दुनिया में हर फिल्म प्यार के कारोबार पर टिकी होती है, कदम-कदम पर मोहब्बत के नग्मे गाए जाते हैं, इश्क के ऐलान किए जाते हैं, वहां एक लहराती हुई आवाज इसरार करती है, "प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज नहीं, एक खामोशी है सुनती है, कहा करती है।"नूर की बूंद की तरह सदियों से सभ्यताओं को रोशन करने वाली मोहब्बत की ये शमा जब गुलज़ार ने थामी तो परवानों को जलाने का खेल पीछे छूट गया और लोगों ने देखी समंदर में परछाइयां बनाती, पानियों के छींटे उड़ाती और लहरों पर आती-जाती वह लड़की जो बहुत हसीन नहीं है, लेकिन अपनी मासूम अदाओं में बेहद दिलकश है। गुलज़ार आए तो अपने साथ नई कला लाए और रिश्तों की नई गहराई भी। उनके गानों में चांद तरह-तरह की पोशाकें पहनकर आता है, नैना सपने बंजर कर देते हैं और बताते हैं कि जितना देखोगे उतना दुख पाओगे।उनके यहां मोहब्बत सिर्फ जिस्मानी नहीं रह जाती, रूहानी हो उठती है। उनकी फिल्मों में वक्त एक उदास नायक की तरह टहलता दिखाई देता है। किसी सुचित्रा सेन और संजीव कुमार को उनके अतीत के दिनों में लौटाता हुआ, वहां फुरसत के रात-दिन हैं और मोहब्बत का हल्का-हल्का ताप है, लेकिन सबसे ज्यादा वह पुकार है, जो बाहर नहीं भीतर उतरती है। यह छोड़कर जाती नहीं, हमेशा साथ रहती है। याद दिलाती है कि खुद को पहचानने के लिए दूसरों को पहचानना भी जरूरी होता है और हमें एक-दूसरे को समझने की, महसूस करने की कुछ खामोश कोशिशें बनाती हैं।



साभार-बात पते की (प्रियदर्शन जी)

8 टिप्‍पणियां:

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने कहा…

गुलजार पर इतना अच्छा लेख पढ़वाने के लिए आभार

advocate rashmi saurana ने कहा…

guljarji par lekha likhane ke liye badhai. ati uttam. likhate rhe.

रंजू ranju ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा है गुलजार जी के बारे में .उनका लिखा सीधा रुह को छू जाता है ..

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

गुलज़ार साहब के बारे में जितना लिखा जाए कम है..

प्रभाकर पाण्डेय ने कहा…

सुंदर और उम्दा लेखन। साधुवाद।

अबरार अहमद ने कहा…

इस बरिस्ता में गुलजार के प्याले में आपकी लेखनी से निकली इस काफी को पीकर मजा आ गया। बहुत खूब। लिखते रहिए इसी तरह। बधाई एक अच्छे लेखन की।

Manish Kumar ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने। हम भी उनके शैदाइयों में से हैं।

Udan Tashtari ने कहा…

आभार इस आलेख के लिए.